कवर्धाछत्तीसगढ़

मोदी की गारंटी फैल, जिले के मजदूरों को पड़ रही भारी ग्रीन इंडिया योजना के मजदूर अपनी मजदूरी के लिए भटक रहे 

मजदूरी पाने दो साल से विभाग के चक्कर काट रहे जिले के सैकड़ों मजदूर

मजदूरी पाने दो साल से विभाग के चक्कर काट रहे जिले के सैकड़ों मजदूर

पीड़ित मजदूर अपनी व्यथा समस्या को लेकर जनसेवक आनंद सिंह से मिले 

पीड़ित मजदूरों को लेकर आनंद सिंह ने संबंधित वन विभाग एसडीईओ व रेंजर से की मुलाकात,भुगतान को लेकर सौंपा ज्ञापन

कवर्धा। भाजपा केंद्र की मोदी सरकार की जिस गारंटी का दम भरकर पहले विधानसभा और अब लोकसभा चुनाव में जिले के मतदाताओं को झांसा देकर फिर एक बार सत्ता हासिल करने की जुगत भिड़ा रही है, उस मोदी गारंटी की जिले में हवा निकल गई है। कहने को बैगा आदिवासी देश के राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र हैं लेकिन दुर्भाग्य का विषय ये है की केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रपति के इन दत्तक पुत्र पुत्रों को दी गई गारंटी पूरी कर पा रही और न ही उनके द्वारा अपने खून पसीने से कमाई गई मजदूरी का भुगतान ही कर पा रही है।

दरअसल वनविभाग द्वारा संचालित केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी ग्रीन इंडिया योजना अंतर्गत कवर्धा जिले के अनेकों वनांचल गांवों में आदिवासी गोड, बैगा परिवार के मजदूरो से करीब दो साल पहले से अब तक में कई जगहों पर उनसे मजदूरी कराई गई थी लेकिन आज ये सैकडो मजदूर अपनी करोड़ों की मजदूरी पाने बीते दो सालों से वन विभाग के चक्कर काटते हुए को दर दर भटक रहे हैं। लेकिन वन विभाग इन्हे न तो मजदूरी दे रहा है और न ही उन मजदूरों कोई संतोषजनक जवाब दिया रहा है। गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार द्वारा ग्रीन इंडिया योजना चलाई जा रही है। जिसे लेकर बड़ी बड़ी बात व विज्ञापन देखने को मिलता है। पर योजना की जमीनी हकीकत शायद यही है की मजदूरों से मजदूरी कराने के बाद भी उन्हें मजदूरी देने विभाग के पास फंड ही नही पहुंच रहा है। जानकारी के मुताबिक इस योजना के तहत किए गए कार्यों में तार फेंसिंग, गड्ढा खुदाई, खंभा लगाना, पौधा रोपण, निदाई आदि मजदूरी मजदूरों से करवाई जाती है। पर मजदूरों को उनकी खून पसीने की मजदूरी भुगतान नहीं किया जा रहा है।

*आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं पीड़ित मजदूर*

लगभग दो वर्षो के कार्यों की मजदूरी न मिलने से आम मजदूर आर्थिक तंगी से जूझ रहे है। वही वे सभी अब अपना धैर्य खोते जा रहे है क्योंकि जो भुगतान की राशि उन्हे नही मिली वो उनके खून पसीने की कमाई है। इस समस्या का खुलासा तब हुआ जब पंडरिया विकासखंड के सुदूर वनांचल ग्राम सिंदूरखार, तेलियापानी, धोबे के आम स्थानीय सीधे साधे आदिवासी मजदूर पंडरिया क्षेत्र के जनसेवक आनंद सिंह के पास उनके कार्यालय अपनी व्यथा लेकर पहुंचे। जहां उन्होंने अपनी इस आर्थिक समस्या और विभागीय उदासीनता तथा केंद्र सरकार की अनदेखी को विस्तृत रूप से उन्हे बताया। इन आदिवासी गरीब मजदूरों की पीड़ा को जानने और समझने के बाद आनंद सिंह ने वन विभाग के एसडीओपी तथा क्षेत्रीय रेंजर से मुलाकात की और मजदूरों की समस्या उनके सामने रखी।जहा इनकी बात रखते हुवे पूरी जानकारी एकत्रित की

*केंद्र सरकार नहीं दे रही मजदूरी के लिए फंड* 

विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस योजना में विगत दो वर्ष पूर्व मजदूरी का काम करने वाले मजदूरों का एक करोड़ दस लाख से अधिक की राशि बकाया है। जिसके संबंध में विभाग के उच्च अधिकारियों को लिखित रूप से कई बार अवगत कराया जा चुका है परंतु आज तक इनकी पूरी मजदूरी की राशि नही आबंटित नहीं की गई है। विभाग के अधिकारियों ने बताया कि उक्त योजना केंद्र सरकार की है राशि केंद्र से आती है। ऐसे में मजदूरों की मजदूरी की राशि कब आयेगी और उन्हें कब भुगतान मिल पाएगा हम बता नहीं सकते।

आनंद सिंह के साथ मजदूरों ने वन विभाग को सौंपा ज्ञापन

अपनी इस व्यथा और पीड़ा को लेकर योजना के नाम पर अपने आप को ठगा समय महसूस करने वाले अंचल के गरीब मजदूरों ने लंबित मजदूरी भुगतान के विषय को लेकर जन सेवक आनंद सिंह के साथ पुलिस अनुविभागीय अधिकारी से भी मुलाकात की ताकि पुलिस प्रशासन भी इस गंभीर विषय को जान सके। साथ ही साथ वन विभाग के अधिकारी को मजदूरों के उपस्थिति में मजदूरी भुगतान से संबंधित ज्ञापन भी सौपा गया। इस दौरान पीड़ित मजदूरों में पतिराम गोड, अघनू बैगा, उपासू बैगा, राधेश्याम गोड, अर्जुन गोड, कोदू बैगा, बिरशू बैगा,सोनिया सिंह, बुद्ध सिंह, तिहारी सिंह, गंगाराम गोड, दुर्गावती गोड, प्रेम सिंह, इतवारी गोड, फागुन गोड, जगतराम गोड सहित अन्य मजदूर उपस्थित थे।

अब लंबित मजदूरी को लेकर कलेक्टर से मुलाकात की तैयारी

आनंद सिंह ने कहा अब इस पूरे विषय पर कलेक्टर से चर्चा करेंगे। उसके बावजूद अगर जल्द से जल्द मजदूरों को उनके हक व मेहनत की मजदूरी राशि नही मिलती तो इस विषय को लेकर जिला वन अधिकारी दफ़्तर में जन मजदूर अधिकार आंदोलन किया जाएगा ताकि सरकार तक इनकी आवाज पहुंच सके।

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