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हर्षोल्लास के साथ मनाई गई कवर्धा के राजशाही दशहरा।

कवर्धा -: भारत के कुछ ही दशहरा आज भी अपने राजशाही दशहरा होने की ख्याति प्राप्त हैं! जिसमें मैसूर बस्तर और कवर्धा के दशहरा का अपना एक अलग पहचान बनी है आजादी के 77 साल बाद भी कवर्धा राज के महाराजा योगेश्वरराजसिंह का उतना ही मान बरकरार है जीतना राजतंत्र में था आज भी कवर्धा राज के लोग राजा जोहार परंपरा रखें है!आज भी लाखों की संख्या में राजा साहब के दर्शन करने आतें हैं ! आज भी राजा का राजशाही दशहरा निकाली जाती है आज भी नगर भ्रमण में लाव लशकर के साथ रथ निकाली गई है आज भी भृमण पश्चात दरबार लगाईं जाती है इसीलिए कवर्धा को धर्म नगरी कहा जाता है कवर्धा राज का अगर इतिहास देखें तो विराट है ।

(कवर्धा राजवँश)

छत्तीसगढ़ के चौदह रियासतों में कवर्धा भी एक प्रमुख रियासत थी। जिनके प्रति लोग आज भी आस्था व प्रेम भाव रखते हैं। फलतः इस राजवंश का इतिहास जानने की इच्छुक लोगों की कमी नही है।

वस्तुतः कवर्धा रियासत, पँडरिया जमींदारी के आदि शासक श्याम चन्द्र के आठवीं पीढ़ी मे दल शाह नामक राजा हुए। इन्हीं दलशाह के वंशवृक्ष कवर्धा रियासत और जमींदारी मे राज्य करते रहे। प्रथा चली आई थी कि यदि कवर्धा या पँडरिया के शासक घराने मे कोई उत्तराधिकारी जन्म न ले तो एक दूसरे के परिवार से बालक गोद ले लेते थे और उसे ही उत्तराधिकारी बना लेते थे अर्थात जब जब कवर्धा के राजा लोग निःसँतान स्वर्ग वासी होते गये, तब तब पँडरिया जमींदारी के वंशज ही इस रियासत के उत्तराधिकारी निर्वाचित होते राजा दलशाह के तीन पुत्र हुए। (1) पृथ्वी सिंह (2) महाबली सिंह (3) हरी सिंह

इन्हीं में से महाबली सिंह को कवर्धा रियासत का सँस्थापक राजा माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि पंडरिया राजवंश का संबंध मँडला के गोंड़ राजवंश से था। जिस समय पँडरिया के जमींदार पृथ्वी सिंह के देहांत होने पर उनके पुत्र गरुड़ सिंह उत्तराधिकारी हुए, उस समय महाबली सिंह उनके दीवान थे। उन्हीं दिनों मँडला नरेश निजाम शाह और सागर नरेश के मध्य युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध मे दीवान महाबली सिंह कुछ सेना लेकर राजा निजाम शाह की सहायता में गये थे। उन्होंने पराक्रम दिखाया। सागर के राजा की हार हुई। अतः मँडला नरेश निजाम शाह ने महाबली सिंह को उनकी सैनिक सहायता के उपलक्ष्य में कवर्धा का अधिकार प्रदान कर सन् 1751 में माँडलिक राजा घोषित किया।

यहाँ के राजाओं की वँशानुक्रम नि.लि.काल खंड मे माना जाता है।

क्र. राजवंश समय

1. महाबली सिंह सन् 1751-1801

2. उजियार सिंह सन् 1801-1849

3. टोकसिंह सन् 1849 1853

4. राजमाता बदन कुँवर सन् 1853-1866

5. बहादुर सिंह सन् 1866-1875

6. रजपाल सिंह सन् 1875-1886

7. राजमाता धूपकुँवर सन् 1886-1908

8. यदुनाथ सिंह सन् 1908-1920

9. राजमाता देवकुमारी सन् 1920-1932

10. धर्मराज सिंह सन् 1932-1948

11. विश्वराज सिंह

12. योगेश्वरराज सिंह

छत्तीसगढ़ में 36 गढ़ थे।

(1) रायपुर (2) पाटन (3) सिमगा (4) सिंगारपुर (5) लवन (6) उमेरा (अमोरा) (7) दुर्ग (8) सरधा (9) सिरसा ( 10 ) खल्लारी ( खल्ववाटिका) (11) मोंहदी (12) सिरपुर (13) फिंगेश्वर (14) राजिम (15) सिंघनगढ़ (16) कोमाखान (17) टेंगनागढ़ (18) अकलतरा।

उपरोक्त गढ़ों में कवर्धा रियासत का नाम शामिल नहीं है। अतः यह कहा जा सकता है कि यह गोंड़वाना के अंतर्गत शामिल रहा होगा।

सन् 1741 में भोंसला शासक नागपुर के रघु जी के सेनापति पंत के नेतृत्व में हैहय वँशी कल्चुरि शासक रघुनाथ सिंह को पराजित कर रतनपुर राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और एक प्रबल प्रतापी राज्य का अंत हो गया था। इसी तरह रायपुर शाखा के कलचुरि शासक अमर सिंह की गद्दी सन् 1750 में छीन ली गई। कलचुरियों का छत्तीसगढ़ में अंतिम पराभव हो गया।

इस तरह सन् 1741-42 का वर्ष छत्तीसगढ़ के इतिहास मे युगांतर कारी वर्ष माना जाता है।

इस प्रकार माना जा सकता है कि कवर्धा राजवंश का सँबँध कलचुरि शासकों के साथ नहीं रहा।

चूंकि महाबली सिंह का राज्य काल 1751 से माना जाता तक छत्तीसगढ़ मे मराठों (सन् 1741) का शासन स्थापित हो गया था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देशी रियासतों का भारतीय सँघ में विलय हुआ । कवर्धा रियासत भी जनवरी 1948 मे भारतीय सँघ में राजा धर्मराज सिंह के हस्ताक्षर करते ही विलय गया।

राजा धर्मराज सिंह स्वामी करपात्री जी महाराज से बहुत प्रभावित थे। स्वामीजी महाराज के द्वारा स्थापित राम राज्य परिषद के बैनर तले संसदीय व विधान सभा चुनावों में चुनाव लडे। 1952 के संसदीय चुनाव में राजा धर्मराज सिंह प्रत्यासी होकर पराजित हुए तो कवर्धा विधान सभा चुनाव क्षेत्र से स्व पँडित गँगाप्रसाद उपाध्याय एवँ पँडरिया विधानसभा चुनाव क्षेत्र से से पँडरिया राजा पद्मराज सिंह रामराज्य परिषद से निर्वाचित हुए।) 1957 के विधानसभा चुनाव मे कवर्धा से राजा धर्मराज सिंह एवँ पँडित गँगाप्रसाद उपाध्याय पँडरिया से रामराज्य परिषद से विजयी हुए। 1960 मे धर्मराज सिंह के निधन से रिक्त उपचुनाव मे राजा विश्वराज सिंह विधायक बने 11962 के चुनाव मे कवर्धा से राजा विश्वराज सिंह तो पँडरिया से उनके अनुज श्री यशवंत राज सिह विधायक बने। 1967 के विधानसभा चुनाव मे राजा विश्वराज सिंह कवर्धा से पुनः निर्वाचित हुए। 1972 के चुनाव मे कवर्धा से राजा यशवंतराज सिह प्रत्याशी बनाये गये और विजयी हुए। 1977 मे रानी साहिबा शशिप्रभादेवी निर्दलीय रामराज्य परिषद के समर्थन से विजयी हुईं तो 1980 मे निर्दलीय मरहूम श्री हमीदुल्ला खाँ से पराजित। 1985 मे रानी साहिबा काँग्रेस में शामिल होकर विधायक बनी। 1990 में रानी साहिबा को काग्रेस टिकिट नही मिला। भाजपा के डा रमन सिह1990 एवँ 1993 मे विधायक बने । 1998 एवं 2003 मे युवराज श्री योगेश्वर राज सिंह काँग्रेसी विधायक बने।इस तरह कवर्धा राज का दशहरा अपने आप में राजशाही बरकरार है।

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